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फाइलों का जिन्न, बोतलों की खनक और बुझी हुई बत्ती—करंट वाले महकमे का नया अध्याय

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Sanjeev Sharma

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बरेली: बिजली विभाग में करोड़ों का खेल
करंट वाले महकमे में भूचाल थमने का दावा भले किया जा रहा हो, लेकिन भीतरखाने जमीन अब भी दरक रही है। कहानी के दो बड़े किरदार हैं एक वह, जो उस पावन धरती पर तैनात है जहां भगवान बुद्ध ने शरीर का त्याग किया था, और दूसरा वह, जो मुख्यालय की कुर्सी पर बैठा फाइलों के ढेर में अपने भविष्य की तलाश कर रहा है।
बुद्ध की धरती पर राजकाज संभाल रहे साहब ने खेल कम खेले। शायद माहौल का असर रहा या शायद जोखिम उठाने की आदत नहीं थी। वहां सन्नाटा है, शांति है और चर्चा भी सीमित। लेकिन चर्चा का असली बाजार तो मुख्यालय में लगा है।

यहां बैठे साहब को यकीन है कि उनके पीछे फाइलों का जिन्न पड़ा है वही जिन्न, जो हर प्रमोशन फाइल में घुसकर तारीख बढ़ा देता है। साहब दिन-रात उसी जिन्न को भगाने की जुगत में हैं। कभी फाइलें दुरुस्त कराई जाती हैं, कभी सिफारिशों की धूप-बत्ती जलाई जाती है।
इसी बीच कंप्यूटर ऑपरेटर के साथ मिलकर जो खेल शुरू किया गया था, वह अब खुद साहब के लिए पावर कट बन गया है। जिन बटनों से दूसरों की बत्ती गुल होती थी, वही बटन अब साहब की कुर्सी के नीचे चिंगारी छोड़ रहे हैं। खेल उम्मीद से ज्यादा सफल हुआ, और सफलता ही अब सबसे बड़ा अपराध बन गई है।

बीस-तीस हजार की दारू की बोतलें उड़ाने वाले साहब की हालत अब यह है कि जाम की खनक सुनते ही नींद उड़ जाती है। जो महफिलें कभी शान समझी जाती थीं, वही अब डरावने सपनों में बदल गई हैं। गलियारों में फुसफुसाहट है जितनी बोतलें खाली हुईं, उतनी ही फाइलें भारी हो गईं।

चर्चा यह भी है कि बुद्ध की तपोभूमि पर तैनात साहब ने भले ही कम खेल खेले हों, लेकिन मुख्यालय में बैठे साहब के लिए यह भूत जीवन भर की पूंजी चाटने को तैयार बैठा है। कहते हैं, इतना देने के बाद भी यह साया पीछा छोड़ दे इसकी कोई गारंटी नहीं।

उधर झुमके के शहर की जनता सबसे ज्यादा उलझन में है। सवाल सीधा है अब रोएं तो किसके सामने? जिनसे उम्मीद थी, वे या तो ध्यान मुद्रा में हैं, या फाइलों के जिन्न से नजरें चुरा रहे हैं।
फिलहाल करंट वाले महकमे में सन्नाटा है। लेकिन यह सन्नाटा शांति का नहीं, आंधी से पहले की खामोशी बताया जा रहा है।

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