चुनाव का मौसम आते ही नेताओं के एजेंडे बदल जाते हैं। काम और विकास की बातें पीछे छूट जाती हैं और आगे आ जाता है कैमरे के सामने इमोशनल ड्रामा। इस बार सुर्खियों में हैं नेताजी, जिन्होंने दावा किया कि उन्होंने 20 हज़ार बहनों से राखी बंधवाई। पहली नज़र में सुनकर यह आयोजन भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक लगता है। लेकिन जैसे ही जनता ने इस दावे का गणित निकाला, मामला एकदम नेताजी का राखी पीआर स्टंट जैसा लगने लगा।

20 हज़ार राखी का चुनावी नाटक
नेताजी की पीआर कंपनी ने इस बार भी कमाल का दांव खेला। नेताजी का राखी पीआर स्टंट यानि चुनावी प्रचार 2025 किया गया।
- हजारों बहनों को न्योता भेजा गया,
- मिठाई और गिफ्ट का इंतज़ाम किया गया,
- स्पॉन्सर से खर्च उठवाया गया,
- और मीडिया कवरेज की पूरी स्क्रिप्ट तैयार कर दी गई।
अगली सुबह हेडलाइन गूंज उठी, नेताजी ने बंधवाई 20 हज़ार राखियां
सोशल मीडिया पर भी तस्वीरें और वीडियो छा गए। कहीं नेताजी गले में राखी पहने नज़र आए तो कहीं बहनों को गिफ्ट देते। तस्वीरों में सबकुछ परफ़ेक्ट लग रहा था—शायद ज़्यादा ही परफ़ेक्ट!
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लेकिन गणित कहता है—दावा फेल!
ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए, अगर एक महिला को राखी बांधने में सिर्फ 10 सेकंड लगते हैं, तो 20 हज़ार राखियां बांधने में लगेंगे पूरे 2 लाख सेकंड। यानी करीब 55 घंटे 30 मिनट। यह तो सिर्फ बांधने का समय है। इसमें नेताजी के गिफ्ट देने, फोटो खिंचवाने और इंस्टा-रील शूटिंग का समय जोड़ लीजिए, तो यह आयोजन असंभव ही लगता है।
जनता की जुबान पर तंज और ठहाके
- शहर की गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक लोग चुटकी ले रहे हैं।
- “नेताजी का असली काम कम है, कैमरे और जुमले ज़्यादा।”
- “राखी से बेरोज़गारी मिटेगी क्या? सड़क बनेगी क्या? बिजली सुधरेगी क्या?”
- “भाई-बहन का रिश्ता भी अब चुनावी हथियार बना दिया गया है।”
यानी जनता समझ रही है कि यह सब सिर्फ पब्लिक रिलेशन का जादू है। असल मुद्दों से ध्यान हटाकर नेताजी भावनात्मक कार्ड खेल रहे हैं।
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राजनीति का नया समीकरण : पीआर ओवर पब्लिक सर्विस
भारतीय राजनीति अब काम के एजेंडे पर नहीं, बल्कि कैमरे के एंगल पर चल रही है। कभी नेताजी मंदिर में दर्शन करते नज़र आते हैं, कभी सड़क किनारे चाय पीते दिखते हैं, और अब 20 हज़ार राखियों का शो। सवाल उठना लाज़मी है क्या यह सब जनता के लिए है या सिर्फ चुनावी लाइक्स और शेयर जुटाने के लिए?
असली एजेंडा क्या है?
जनता का कहना है कि नेताजी का असली एजेंडा विकास नहीं, बल्कि चुनाव जीतना और बेटे को राजनीति में सैटल करना है। बाकी सब रील कंटेंट है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित किया कि राजनीति में सच्चाई से ज्यादा मैनेजमेंट और इमोशनल ड्रामा का बोलबाला है। नेताजी का “20 हज़ार राखी प्रोजेक्ट” जनता को भाईचारे से जोड़ने की बजाय, झूठे दावों और अतिशयोक्तियों का तमाशा बनकर रह गया।










