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भोजीपुरा पुल घोटाला के बाद ‘सप्लाई ऑर्डर’ घोटाला

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भोजीपुरा पुल घोटाला

बरेलीभोजीपुरा अगरास रोड और पुल निर्माण में मची गड़बड़ी पर स्याही सूखी भी नहीं थी कि लोक निर्माण विभाग का एक और कारनामा सामने आ गया है। अब विभाग के भीतर “सप्लाई ऑर्डर” के नाम पर करोड़ों रुपये का खेल पकड़ा गया है। ऐसा खेल, जिसमें ठेकेदारों को माल सप्लाई करने का ठेका तब दिया गया जब उसी साइट पर पहले से टेंडर चल रहा था। मतलब साफ है एक ही परियोजना पर दो बार सरकारी खजाने पर डाका, और अफसरों की जेब में बोनस रोशनी!

सप्लाई ऑर्डर: बजट खपाने का नया हथियार

“लोकतंत्र टुडे” को प्राप्त दस्तावेज़ों के मुताबिक, विभाग ने मार्च महीने में 50 लाख रुपये से अधिक के सप्लाई ऑर्डर जारी किए, वो भी ऐसे समय जब वित्तीय वर्ष खत्म होने को था। ये ऑर्डर उन्हीं साइटों पर जारी किए गए, जहां पहले से ठेकेदार फर्म काम कर रही थी। सरकारी कागजों में दिखाया गया कि “अतिरिक्त सामग्री” खरीदी गई, मगर जमीन पर ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया।

इंजीनियरों का जादू ऐसा कि एक ही सड़क पर दो बार बिल पास

सूत्रों के मुताबिक, सप्लाई ऑर्डर की असली कहानी 10 फीसदी माल और 90 फीसदी मालामाल की है। भुगतान का 10 फीसदी हिस्सा ठेकेदार को मिलता है, जबकि शेष 90 फीसदी रकम अफसरों की जेब में पहुंच जाती है। इस खेल में अधिकारी अपने भरोसेमंद ठेकेदार चुनते हैं, जो भुगतान मिलते ही “कमीशन वितरण योजना” शुरू कर देते हैं।

ई-टेंडर नहीं, ‘ई-ट्रिक’ चलती है

ई-टेंडर के जरिये वही सामान 30–40 फीसदी सस्ता खरीदा जा सकता था, लेकिन वहां “कमीशन की हवा” नहीं चलती। इसलिए विभागीय अधिकारी नियमों की बजाय नीतियों से काम चलाना पसंद करते हैं। क्योंकि नियम से विभाग को फायदा होता है, और नीयत से अधिकारी को।

हिमगिरि कंस्ट्रक्शन और मुरादाबाद कनेक्शन

जांच में सामने आया है कि अधिकांश सप्लाई ऑर्डर हिमगिरि कंस्ट्रक्शन (मुरादाबाद) और पीएस इंटरप्राइजेज (अमरोहा) को जारी किए गए। दोनों को 10-10 लाख रुपये के पांच से अधिक ऑर्डर दिए गए, और सभी भुगतान मार्च महीने में निपटाए गए। सूत्र बताते हैं कि विभाग के कुछ इंजीनियर पहले अमरोहा और मुरादाबाद डिवीजन में तैनात रहे हैं। वहीं से उन्होंने अपनी “विश्वासपात्र ठेकेदार मंडली” को बरेली बुलाकर सप्लाई ऑर्डर महोत्सव मना लिया। यानी, इंजीनियर ट्रांसफर होते हैं, मगर ठेकेदार साथ ही शिफ्ट हो जाते हैं।

नियमों की सर्जरी — बजट इधर का उधर

लोक निर्माण विभाग के नियमों के अनुसार किसी एक परियोजना का बजट दूसरी परियोजना में नहीं लगाया जा सकता। मगर अफसरों ने अपने “इन्वेंटिव स्कीम” के तहत बजट को एक मद से दूसरी मद में ट्रांसफर कर दिया। जहां काम अधूरा था, वहां बजट सरेंडर होना चाहिए था। लेकिन अफसरों ने “सप्लाई ऑर्डर का रास्ता” निकाल लिया इससे बजट भी खप गया, और कमीशन भी।

अटामांडा, धौराशाही और बहेरजगीर मार्ग पर दो-दो ऑर्डर

जानकारी के मुताबिक, अटामांडा–धौराशाही–मिर्जापुर मार्ग और नवाबगंज–दलेलनगर–बहेरजगीर मार्ग पर हिमगिरि कंस्ट्रक्शन को 10-10 लाख रुपये के दो-दो सप्लाई ऑर्डर दिए गए। इसी तरह पीएस इंटरप्राइजेज को भी करीब 10 लाख रुपये का ऑर्डर जारी किया गया। ये सभी ऑर्डर वित्तीय वर्ष खत्म होने से पहले बजट खपाने की जल्दबाजी में तैयार किए गए।

अधिकारी ‘साइलेंट मोड’ पर

जब इस संबंध में प्रांतीय खंड के अधिशासी अभियंता भगत सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनका फोन नहीं उठा। शायद फोन भी जानता था कि “सप्लाई ऑर्डर की रिंगटोन बंद रखना ही बेहतर है।”

प्रमुख सचिव ने तलब की रिपोर्ट

लोकतंत्र टुडे के खुलासे के बाद प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग अजय चौहान ने भोजीपुरा-अगरास पुल और सड़क निर्माण में हुई अनियमितताओं की जांच रिपोर्ट तलब कर ली है। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि “अनुभवहीन फर्मों के साथ नियम विरुद्ध अनुबंध करने और गलत भुगतान करने” के मामलों में कड़ी कार्रवाई की जाए।

विभाग में अब ‘सप्लाई ऑर्डर राज’

बरेली में लोक निर्माण विभाग के अंदर “सप्लाई ऑर्डर” अब ठेकों से भी बड़ा ठेका बन गया है। यह सिस्टम ऐसा है जहां सड़कें टूटती हैं, मगर “सप्लाई ऑर्डर” कभी नहीं टूटता। क्योंकि यह वो पुल है जो इंजीनियरों और ठेकेदारों के बीच रिश्ता मजबूत करता है।

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