बरेली। रुहेलखंड नहर से इतिहास का ऐसा पन्ना बाहर आया है, जिसने शहर ही नहीं पूरे प्रदेश का गौरव बढ़ा दिया है। झाड़ियों और घास-फूस के नीचे छुपा पड़ा अंग्रेज़ों का सौ साल पुराना भाप से चलने वाला अंग्रेजों का ट्रैक्टर( British tractor ) अब लोगों के सामने अपनी पूरी शान के साथ खड़ा होने को तैयार है। कभी खेतों की जुताई करता था, कभी नहरें बनवाता था और अब बनेगा इतिहास का चमचमाता सितारा।
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घास-फूस से निकला विरासत का खजाना
बरेली की रुहेलखंड नहर खंड थर्ड ( Rohilkhand Canal Divison Bareilly ) के सहायक अभियंता अजीत कुमार की नजर डिवीजन ऑफिस के पीछे घास फूस में एक लोहे की आकृति पर पड़ी। पहले लगा कोई कबाड़ पड़ा होगा, लेकिन पास जाकर देखा तो चौंक गए, यह तो अंग्रेज़ों का असली इंजीनियरिंग चमत्कार था। उन्होंने तत्कालीन अधिशासी अभियंता नवीन कुमार को सूचना दी।

इसी बीच विभाग में तबादले की प्रक्रिया हुई और नए अधिशासी अभियंता सर्वेश चन्द्र ने पद संभाला। उन्होंने इस दुर्लभ धरोहर को मिट्टी और घास-फूस से बाहर निकलवाने का बीड़ा उठाया। देखा तो अंग्रेजो के जमाने का ( British tractor ) निकला। धीरे-धीरे इंजन को साफ किया गया, ग्रीस-तेल लगाया गया और अब इसका रंग-रोगन हो रहा है। जल्द ही यह चमचमाता इंजन लोगों के सामने खड़ा होगा।
British tractor अंग्रेजो के दौर की इंजीनियरिंग का नमूना
विशाल लोहे के पहिए, लंबी धुआं उड़ाती चिमनी और गड़गड़ाता बॉयलर, सोचिए जब यह खेतों और नहर किनारे पूरे दमखम से चलता होगा तो नज़ारा कैसा रहा होगा। यह इंजन साधारण मशीन नहीं है। जानकार मानते है कि यह इंजन इंग्लैण्ड का बना हो सकता है। John Fowler & Co. (Leeds, England) और Marshall Sons & Co. (Gainsborough, England) की इन कंपनियों ने 1880 से 1930 के बीच ऐसे ट्रैक्टर बनाए थे, जो भारत समेत पूरी दुनिया में मशहूर हुए।

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जानिये इस लोहे के शेर का क्या था इस्तेमाल
- खेतों की गहरी जुताई
- अनाज की थ्रेशिंग
- नहर और सड़क निर्माण
- भारी सामान ढोने जैसे कामों में किया जाता था।
बरेली की मिट्टी से इतिहास की खुशबू
भारत में अब ऐसे स्टीम ट्रैक्शन इंजन ( British tractor ) गिने-चुने ही बचे हैं। कुछ नमूने चेन्नई और रुड़की जैसे शहरों के म्यूजियम में रखे हैं। बरेली का यह इंजन उन चुनिंदा धरोहरों की कतार में जुड़ने जा रहा है। यह सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि उस दौर का साक्षात प्रमाण है जब भारत में बड़े पैमाने पर नहरें और सड़कें बनाई जा रही थीं। ब्रिटिश इंजीनियरिंग की ताकत और भारतीय मेहनतकश हाथों का मेल ही ऐसी परियोजनाओं को संभव बनाता था।
अधिकारियों की मेहनत से बचा इतिहास
इस धरोहर को बचाने में नहर खंड की टीम का बड़ा योगदान है। सहायक अभियंता अजीत कुमार की पैनी नज़र ने इसे सबसे पहले पहचाना। अधिशासी अभियंता नवीन कुमार ने इसकी जानकारी ली, रुचि दिखाई, और सर्वेश चन्द्र ने इसे बाहर निकलवा कर मरम्मत व संरक्षण की राह दिखाई। अगर समय रहते यह पहल न होती, तो यह विरासत हमेशा के लिए मिट्टी में दबी रह जाती।
बरेली में चमकेगा सितारे की तरह
अब योजना है कि इस इंजन ( British tractor ) को पूरी तरह साफ-सुथरा और रंगा-पुता कर रूहेलखंड नहर के कैंट स्थित निरीक्षण भवन में रखा जाए। जब यह चमकता हुआ निरीक्षण भवन में खड़ा होगा, तो आगंतुकों को यह सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं लगेगा, बल्कि बीते वक्त की वह धड़कन लगेगा जो कभी खेतों में, नहरों पर और सड़कों पर गूंजा करती थी। रूहेलखंड नहर से निकला यह ट्रैक्शन इंजन बताता है कि इतिहास हमेशा किताबों में बंद नहीं होता। कभी-कभी वह मिट्टी, झाड़ियों और कबाड़ के ढेर में छुपा खजाना बनकर सामने आता है।











